चुडेल का प्रेम – Horror stories in Hindi
चुडेल का प्रेम – Horror stories in Hindi
रमेसर काका के पास एक लेहड़ा गायें थीं। वे प्रतिदिन सुबह ही इन गायों को दुह-दाहकर चराने के लिए निकल पड़ते थे। सुबह से लेकर शाम तक रमेसर काका गायों को लेकर इस गाँव से उस गाँव, तो कभी नदी किनारे, तो कभी-कभी इस जंगल से उस जंगल घूमा करते थे और दिन ढलते ही गाँव की ओर निकल पड़ते थे। जब रमेसर काका गायों को चराने के लिए निकलते तो सत्तु और भुजाभरी के साथ ही कभी-कभी दही, दूध आदि भी ले जाते और भूख लगने पर किसी पेड़ की छाया में बैठकर खाते-पीते। रमेसर काका कभी भी अपने साथ पानी नहीं ले जाते और ना ही लोटा रखते। प्यास लगने पर या तो वे नदी का जल पीते नही तो जंगल, सरेह (गाँव से बाहर का खुला खेत आदि भाग जिसमें दूर-दूर तक कोई बस्ती, घर आदि न हो) आदि में होने पर लाठी से मारकर महुए और आम आदि के पत्ते तोड़कर उन्हें अपने गमछे की एक छोर में बाँधते और फिर इस गमछे के दूसरे छोर को अपने साथ सदा लिए रहने वाली धोती के एक छोर से बाँधते तथा फिर इसे किसी कुएँ में डालकर पानी निकालते। इस विधि को झोंझ कहते है, इसमें बहुत अधिक पानी तो नहीं निकलता पर 2-3 बार में पीने भर का पानी अवश्य निकल आता है।
एक बार की बात है कि रमेसर काका बीमार पड़ गए। अब उनके गाय-गोरू को चराने कौन ले जाए? वे बहुत परेशान हुए क्योंकि एक दिन भी इन गायों को चराने में देर होने पर यह बोलने लगती थीं और खूँटे के पास हग-मूतकर इतना चकल्लस करती थीं कि खूँटे के आस-पास की जगह सने गोबर-माटी से भर उठती थी और जबतक इन्हें खोला नहीं जाता रंभाती रहतीं। एक दिन बीता, दो दिन बीता पर रमेसर काका की तबियत ठीक नहीं हुई। रमेकर काकाबS इन दो दिनों में गायों के आगे पुआल या खाँची में भूसा-घास आदि डाल देतीं और पानी आदि दिखा देंती पर गाएँ प्यास लगने पर पानी तो पी लेतीं पर पुआल आदि खाने का नाम नहीं लेतीं और बेचैनी से खूँटों के आस-पास घूमा करतीं। इन दो दिनों में तो कुछ गायों ने अपना पगहा भी तोड़ दिया और चरने के लिए भागने लगीं। कैसे भी करके रमेसर काकाबS ने इन गायों पर काबू किया।
तीसरे दिन भी रमेसर काका की तबियत जब ठीक नहीं हुई तो उन्होंने सनेसा भेजकर अपने ससुराल से अपने सरपुत घनेसर को बुला लिया। घनेसर सोरह-सत्रह साल का किशोर था और बहुत ही सुंदर तथा भला-चंगा था। घनेसर ने आते ही अपने फूफा का सारा काम संभाल लिया।
घनेसर बहुत ही समझदार लड़का था। वह प्रतिदिन भिनसहरे 3 बजे ही जग जाता और नित्य क्रिया से निपटकर 5 बजे तक पढ़ाई करता और उसके बाद गायों को खोलकर चराने के लिए निकल पड़ता। वह अपने साथ अपनी पुस्तकों का बेठन ले जाना कभी नहीं भूलता। किसी चरने वाली जगह पर गायों को चरता छोड़कर वह किसी पेड़ आदि की छाया में बैठकर पढ़ाई करता।
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